मेरी बिटिया
है थोड़ी नटखट पर है बहुत भोली, पर उसने तो आज जिद ही पकड़ ली, लिखती हो माँ तुम हर रोज सब पर, लिखो कुछ थोड़ा सा आज मुझ पर, सोच रही हूँ क्या लिखूं बेटी तुम पर, तुम तो गई हो बिल्कुल हम सब पर। फिर आया आज दिन वह याद, जब देखा था तुम्हे पहली बार, लग रही थी छोटी सी गुलाबी गुड़िया, जैसे हो कोई जादू की पुड़िया, नज़र नहीं हटती थी तुम पर से, आयी थी जीवन में तुम जब से, माना था ईश्वर का बहुत उपकार , खुशियों से जो भर दिया था हमारा संसार। दिनरात गुजरते थे करते तुम्हारी बातें, दिखाती थी तुम रोज नये कई अजूबे, डकलिंग जैसे मटककर तुम्हारा चलना, फिर चलते चलते धड़ाम से गिर पड़ना, तेजी से दौड़ कर वो हमारी तरफ आना, और फिर मस्ती में परदे के पीछे छुप जाना, नन्हे हाथों से सीखा जब खाना और लिखना, तुम्हारे साथ जिया हमने फिर से अपना बचपना । दिन में तो तुम रहती थी नींद में गहरी, पर रात में चमकती थी आँखे जैसे मोती, तुम्हारी एक शरारत भरी मुस्कान, मिटा देती थी हमारी सारी थकान, पर पड़ती थी जब तुम कभी बिमार, होता था सबका खाना दुष्वार, कैसे इतनी जल्दी बीत गए वो दिन, रहीं नहीं तुम छोटी अब हो चली बड़ी...