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Showing posts from December, 2018

मेरी बिटिया

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है थोड़ी नटखट पर है बहुत भोली, पर उसने तो आज जिद ही पकड़ ली, लिखती हो माँ तुम हर रोज सब पर, लिखो कुछ थोड़ा सा आज मुझ पर, सोच रही हूँ क्या लिखूं बेटी तुम पर, तुम तो गई हो बिल्कुल हम सब पर। फिर आया आज दिन वह याद, जब देखा था तुम्हे पहली बार, लग रही थी छोटी सी गुलाबी गुड़िया, जैसे हो कोई जादू की पुड़िया, नज़र नहीं हटती थी तुम पर से, आयी थी जीवन में तुम जब से, माना था ईश्वर का बहुत उपकार , खुशियों से जो भर दिया था हमारा संसार। दिनरात गुजरते थे करते तुम्हारी बातें, दिखाती थी तुम रोज नये कई अजूबे, डकलिंग जैसे मटककर तुम्हारा चलना, फिर चलते चलते धड़ाम से गिर पड़ना, तेजी से दौड़ कर वो हमारी तरफ आना, और फिर मस्ती में परदे के पीछे छुप जाना, नन्हे हाथों से सीखा जब खाना और लिखना, तुम्हारे साथ जिया हमने फिर से अपना बचपना । दिन में तो तुम रहती थी नींद में गहरी, पर रात में चमकती थी आँखे जैसे मोती, तुम्हारी एक शरारत भरी मुस्कान, मिटा देती थी हमारी सारी थकान, पर पड़ती थी जब तुम कभी बिमार, होता था सबका खाना दुष्वार, कैसे इतनी जल्दी बीत गए वो दिन, रहीं नहीं तुम छोटी अब हो चली बड़ी...

मेरा सपना

                            देखा था कल रात मैंने भी एक सपना,                    जिसमे थे सभी अनजान कोई था ना अपना,                                पर उन अनजान लोगों से था कोई भय ना।                                    काश यह सपना नहीं होता एक सच ,                                      तो न टूटती किसी की आस,              ना ही उठता किसी पर से विशवास।            आजकल के तेजी से बदलते युग में, जब रही नहीं आस्था अपनो पर , तो कैसे करे एतबार परायो पर।          पता नहीं वह कल कब आएगा,        ...

खुद से पहचान

खुद से पहचान चलो कराते हैं आज, खुद से खुद की पहचान, क्या था मुझे पसंद, और करती थी क्या नापसंद,  कितने देखे सपने बंद आँख , और कितने ख़्याब खुली आँख, छूटे थे पढ़ने कितने पन्नें उस मनपसंद किताब के, जो भूल गए थे वह पुरानी सब बात , कर लेते हैं उन्हें फिर से आज याद, चलो करते है उन पर से धुल सब साफ़…. किस बात से चिढ़ती थी मैं सबसे ज्यादा, किस बात पर होता था भाई-बहन से विवाद, कैसे डरती - छुपती थी बिजली की चमक से , चलाती थी कैसे बारिश के पानी में कागज की नाव , छोटी-छोटी बातों पर कैसे करती दोस्तों से तकरार, कैसे भूल जाती कुछ ही पल में बड़ी से बड़ी बात, ग़लती होने पर कैसे छुपती थी बिस्तर के नीचे, और क्या-क्या करती थी नादानियाँ दिन रात, भूल गयी हूँ वह पुरानी सब बात , चलो करते है उन पर से धुल सब साफ़… गुड्डे -गुड़िया की शादी का था एक अलग ही चाव, किसकी गुड़िया - किसका गुड्डा इसी बात पर करती विवाद , वह छोटे- छोटे बर्तनों में बनाती झूट मूठ का खाना, लंगड़ी, पिट्ठू, सितोलिया से बहलाती दिल अपना , चढ़े रहती पेड़ों पर दिन भर तोड़ते आम और जाम, भागती कटी पतंग के पीछे छोड़कर अपनी जान, बिज...

एक विषय गंभीर

लोग कहते थे हमेशा यही , कॉलेज जाते है पढ़ने सभी। बात हमने सबकी मानी, और मन लगाकर पढ़ने की ठानी । लगाया सभी विषयों में मन कुछ खास, और हुए भी अच्छे नंबरों से पास, पर इतने दिन बीत चुके हैं आज, रहे नहीं सब विषय वह याद । पर जब मिले कल पार्टी में कुछ दोस्त यार , पता चला कॉलेज की पढ़ाई थी हमारी सारी बकवास। सभी कर रहे थे चर्चा एक विषय गंभीर पर कुछ खास, उस विषय पर चर्चा से ही सभी का था हाल बेहाल। समझ न आया हमको कुछ और बने रहे एक बुत, जाने कौन सा था विषय वह अद्भुत। जो इतने सालो बाद भी है सभी को याद, जैसे कल ही खोली हो उसकी किताब, जिसका एक ज़िक्र ही भर देता है दिलों में मीठास | लगता है फिर से कॉलेज जाना होगा, विषय गंभीर पर अपना ज्ञान बढ़ाना होगा, तभी होगा हमारा भी कुछ उद्धार , आयेगी हमारे जीवन मे भी एक मीठास, नहीं तो हो जायेगा जीवन बेकार | सुरेखा  26 12 18

आज का फसाना

हुया पार्क में आज एक नया फसाना, मॉर्निग वाक पर मिला कोई दोस्त पुराना, लग रहा था उसका चेहरा कुछ जाना पहचाना, हमने तो उसे नहीं पहचाना, पर बातों ही बातों में कर दिया बया उसने हमारा पुराना अफ़साना, फिर भी याद आया न वो, नाही हमने उन्हे पहचाना, अगर पता चले आपको तो हमें भी उनका नाम बताना। कह कर जुदा हुए कि शादी में तो थे मिले, पर नहीं बताया कि किसकी शादी में और कँहा मिले। सोच कर हो रही हूँ परेशान, कि, कब की हमने शादी अटेंड जँहा इनसे हुई थी जान पहचान। लगता है आज का दिन इसी कशमकश में जायेगा,  कि देखा था इन्हे कँहा और कँहा हुई थी पहचान, अब कोस रही हूँ खुद को क्यों फेकी मैंने , उनकी तरफ़ अपनी एक मीठी सी मुस्कान। पर चलो मिला तो कुछ  लिखने को आज नहीं तो सिर्फ दुआयों से चलाना पड़ता काम। फिर कहती हूँ आप सबसे यही ,  मिल जाये यदि वो कंही या , याद आये उनका नाम तो हमें भी बताना। सुरेखा 25 .12. 18

Yaddasth

याददाश्त  इतने जतन से सहेज कर रखा था जिसे कल यहां ,  बहुत ढूंढने पर भी वह चीज नहीं मिली वहां ,  अब याद भी आता नहीं कि वह रखी थी कहां I घर का सारा सामान उलट-पुलट कर डाला ,  न हीं मिली वह चीज ना ही कुछ याद आया,  ना जाने उस चीज को वहाँ से किसने हटाया I  लो अब जाकर मिलगई वह  चीज है,  जिसकी अब कोई जरूरत रही नहीं है।  पर जिसे अभी ढूंढ रही हूं वह चीज  है कहां,  अब तो याद नहीं रहता कि ढूंढ रही हूं  किसे  और कहां, भगवान जाने  रोज-रोज का  यह चक्कर खत्म होगा कहां I  आजकल ज्यादातर समय कुछ ना कुछ ढूंढने में जाता है,  इसलिए पता नहीं सारा वक्त कहां चला जाता है, और जीवन के हसीन पल परेशानी में बदल जाते हैं I लगता है कि अब बूढ़ी हो चली हूं,  जो चीजों को भूलती चली हूं, नहीं अभी तो मैं जिंदगी जीने चली हूं I  क्या कर लूं अपनी जरूरतों को कम,  जिससे  चीजों को ढूंढने में जाया होगा वक्त  कम, और जिंदगी जीने का मजा आएगा हरदम I   सुरेखा 

समय

समय की बहुत कोशिश और लाख जतन, कि बन्द करलू अपनी मुट्ठी में हर पलछीन। क्या पता था जो बीत गया है पल, वो वापस ना आयेगा, और समय का चक्र, बस ऐसे ही चलता जाएगा। फिसल गया समय हाथों से मेरे  ऐसे, कि ढह गई हो रेत की कोई दीवार जैसे, खड़ी हूँ जब ऊम्र के इस पड़ाव पर मैं, सोच रही हूँ, क्या पाया है मैंने, और क्या है खोया। समय को क़ैद करने की जद्दोजहद में इतना समझ में आया, अगर बिता दिया बचा समय भी गिले शिकवों में, तो मेरे हाथ कुछ नहीं आएगा। समय तो बिताना है बितता ही जायेगा, और कभी मेरी पकड़ में ना आएगा। इसलिए जिओ जिंदगी को ऐसे, जिंदादिली के साथ, कि हर पल में झलके आपके अलग अंदाज।