खुद से पहचान
खुद से पहचान
चलो कराते हैं आज,
खुद से खुद की पहचान,
क्या था मुझे पसंद,
और करती थी क्या नापसंद,
कितने देखे सपने बंद आँख ,
और कितने ख़्याब खुली आँख,
छूटे थे पढ़ने कितने पन्नें
उस मनपसंद किताब के,
जो भूल गए थे वह पुरानी सब बात ,
कर लेते हैं उन्हें फिर से आज याद,
चलो करते है उन पर से धुल सब साफ़….
किस बात से चिढ़ती थी मैं सबसे ज्यादा,
किस बात पर होता था भाई-बहन से विवाद,
कैसे डरती - छुपती थी बिजली की चमक से ,
चलाती थी कैसे बारिश के पानी में कागज की नाव ,
छोटी-छोटी बातों पर कैसे करती दोस्तों से तकरार,
कैसे भूल जाती कुछ ही पल में बड़ी से बड़ी बात,
ग़लती होने पर कैसे छुपती थी बिस्तर के नीचे,
और क्या-क्या करती थी नादानियाँ दिन रात,
भूल गयी हूँ वह पुरानी सब बात ,
चलो करते है उन पर से धुल सब साफ़…
गुड्डे -गुड़िया की शादी का था एक अलग ही चाव,
किसकी गुड़िया - किसका गुड्डा इसी बात पर करती विवाद ,
वह छोटे- छोटे बर्तनों में बनाती झूट मूठ का खाना,
लंगड़ी, पिट्ठू, सितोलिया से बहलाती दिल अपना ,
चढ़े रहती पेड़ों पर दिन भर तोड़ते आम और जाम,
भागती कटी पतंग के पीछे छोड़कर अपनी जान,
बिजली गुल होने पर खेलती छुपन छुपाई,
भूल गयी हूँ मैं वह पुरानी सब बात,
करते है उन पर से धुल सब साफ़,
चलो कराते हैं आज,
खुद से खुद की पहचान…
सुरेखा..
चलो कराते हैं आज,
खुद से खुद की पहचान,
क्या था मुझे पसंद,
और करती थी क्या नापसंद,
कितने देखे सपने बंद आँख ,
और कितने ख़्याब खुली आँख,
छूटे थे पढ़ने कितने पन्नें
उस मनपसंद किताब के,
जो भूल गए थे वह पुरानी सब बात ,
कर लेते हैं उन्हें फिर से आज याद,
चलो करते है उन पर से धुल सब साफ़….
किस बात से चिढ़ती थी मैं सबसे ज्यादा,
किस बात पर होता था भाई-बहन से विवाद,
कैसे डरती - छुपती थी बिजली की चमक से ,
चलाती थी कैसे बारिश के पानी में कागज की नाव ,
छोटी-छोटी बातों पर कैसे करती दोस्तों से तकरार,
कैसे भूल जाती कुछ ही पल में बड़ी से बड़ी बात,
ग़लती होने पर कैसे छुपती थी बिस्तर के नीचे,
और क्या-क्या करती थी नादानियाँ दिन रात,
भूल गयी हूँ वह पुरानी सब बात ,
चलो करते है उन पर से धुल सब साफ़…
गुड्डे -गुड़िया की शादी का था एक अलग ही चाव,
किसकी गुड़िया - किसका गुड्डा इसी बात पर करती विवाद ,
वह छोटे- छोटे बर्तनों में बनाती झूट मूठ का खाना,
लंगड़ी, पिट्ठू, सितोलिया से बहलाती दिल अपना ,
चढ़े रहती पेड़ों पर दिन भर तोड़ते आम और जाम,
भागती कटी पतंग के पीछे छोड़कर अपनी जान,
बिजली गुल होने पर खेलती छुपन छुपाई,
भूल गयी हूँ मैं वह पुरानी सब बात,
करते है उन पर से धुल सब साफ़,
चलो कराते हैं आज,
खुद से खुद की पहचान…
सुरेखा..
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