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धुंध

कैसी यह धुंध छाई है चारो ओर , सूझ नहीं रही राह भी सीधी सी, दिखलाये रास्ता कैसे किसी और को, पहुँचाये कैसे उन्हें मंजिल उनकी सही। पता नहीं यह धुंध कब होगी खत्म, दिखेगा सभी को साफ़ साफ़ तभी, तब तक तो बदल गए होंगे हालात सभी, यदि नहीं भगाया यह अंधकार जल्दी ही । अभी तो फसें है सभी अपने और पराये में, चढ़ा कर धुंध गहरी लालच की दिमाग पे, चिन्ता नहीं है जब अपने ही भविष्य की, तो क्या सोचेंगे वो देश की प्रगति की । मची है चारो ओर कुर्सी की खींच तान, पर सोयें है भारतवासी अपनी चादर तान , जब हटेगी चादर सबकी जागेंगे नींद से तभी, तब तक तो हो जाएगी सबकी खटिया खड़ी | अगर रहते हुए समय नींद से ना जागे हम, सभी जगह के और सारे भारतवासी हमारे, बचा ना पायेंगे अपने देश की यह शान, होना होगा तब अपनों का ही गुलाम | अब तो जागों सारे भारत वासी हमारें, मिलकर लगायो जय हिंद के नारे सारे, बचानी है मिलकर देश की आन और शान, तभी बनेगा हमारा प्यारा भारत देश महान!!!!! सुरेखा

मेरे वो और उनके खर्राटें

मेरे वो और उनके दमदार खर्राटे, हर रात एक नया ही राग सुनाते , कल रात तो हुया एक नया अजूबा , सुनने को मिला एक राग बहुत ही अनूठा . कभी बजाते थे सीटी शताब्दी ट्रैन की तरह, तो कभी निकालते थे आवाज़ किसी मेम की तरह, कभी छेड़ते थे तान पुरानी फटफटी की तरह , तो कभी गाते राग मल्हार तानसेन की तरह . सोते हुए पतिदेव के सुनकर इतने सुरीले तान , बड़े बड़े संगीतकार भी हो जाये हैरान परेशान, कैसे निकाल लेते है इनके वो इतने अनूठे स्वर, वह भी सिर्फ़ अपने मुख और नासिका के बल पर . परसों रात की तो बात थी बहुत ही अलहदा, क्योंकि पूरी और कचौरी से था पेट पूरा भरा, लय और ताल का हो रहा था एक अलग ही संगम, मुख और नासिका से लगातार चालू था अनोख़ा वंदन. निकल रही थी इतनी सारी अजीब सी ध्वनि तरंग , जैसे बह रहा हो कोई झरना तेज़ बजाता हुआ मृदंग,  साथ में सुनाई दे रही थी किसी शेर या चीते की दहाड़, पर बीच बीच में आ रही थी किसी मेमने की भी पुकार. होकर बेहाल जगाया हमनें इन्हें सोते से आखिरकार, बंदकर के अपने ख़र्राटे उठते ही बोले हमारे साहब, क्या है जी बात जो तुम सोई नहीं हो गई इतनी रात, बताते अपनी दुविधा...

डिलीट हुआ संदेश

आज कल नया निकला है यह चलन वॉट्सअप पर लिख कर कुछ भी कर देते है फ़िर बाद में डिलीट  कुछ होते है भग्यशाली बड़े जो होते है हमेशा ऑनलाइन पड़े वो पढ़ लेते है सारे सन्देश डिलीट से पहले बाकि रहते है यही सोच में पड़े था कौन सा वह राज़ अनोखा जो सबके सामने उन्होंने था खोला क्या बात थी जो उन्होंने बताई जो किसी और को ना भायी कुछ ही देर में फिर से छिपाई कौन होगा वह अनजाना जिस पर लगाया था यह निशाना जिसे याद दिलाया कोई घाव पुराना जो रह गया हमसे अनजाना अब तो है दुष्वार खाना और पीना जब तक नहीं होता उस संदेश से सामना लिखे संदेशो से ज़्यादा अब तो भाव पाए डिलीट किये संदेश और जगाये लोगो में कौतुहल अनेक सुरेखा 10 . 1 . 19

प्रकृति की सुंदरता

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प्रकृति की सुंदरता है अनुपम, और छटा बहुत ही निराली, जो बनाये इतने सारे सुन्दर, फूल - पत्ते, पेड़ और पौधे, पशु - पक्षी , कीट –पतंगे, और रंग बिरंगी तितलियाँ| समझ में ना आता मेरे, रहस्य यह अनोखा,  कैसे बनाया इन सबको, अलग अलग एक दूसरे से, और कैसे भरा रंग इनमें, वो भी ना ना प्रकार | हर पौधे का रूप अलग है,  पत्तियों का स्वरुप अलग है, फूले की तो बात है निराली, इतने रंग भरे है प्रकृति ने इनमें,  जैसे घोल डाली इंद्रधनुष की सारी स्याही | अगर बात करु मैं  तितली की, समझ ना पाये मेरी छोटी बुद्धि,  कैसे होती है दोनों पंखो में यह सिमिट्री, प्रकृति ने किया कैसे यह चमत्कार , विभिन्न रूप और रंग से सजे, कैसे बनाये इतने प्रकार| बनाने बैठी जब चित्र एक तितली का, देखकर कॉपी करिश्मा कुदरत का, की कोशिश गई सब बेकार , ना भर पाई वो रंग तितली में, ना ही ला पाई वो सीमेट्री पंखो में| पता नहीं देख कर कँहा से, बनाया यह अनमोल खजाना , कैसे आया विचार मन में , जो बनाये इतने सारे प्रकार, और कैसे भरे है अदभुत रंग कुदरत ने, किया कैसे है यह असाधारण  काम | ...

जिंदगी का आइना

अगर हम मुस्करायेंगे तो साथ हमारे मुस्करायेगी जिंदगी, अगर मान लेंगे हार तो हमें हर कदम सताएगी जिंदगी, अगर ठान लेंगे तो हारी बाजी भी जिताएगी जिंदगी, अगर माना इसे अपना तो अपनापन दिखाएगी जिंदगी, अगर माना इसे पराया तो पीठ भी दिखाएगी जिंदगी, अगर लगाया इसे गले तो हर गम भुलायेगी जिंदगी, अगर थामा इसका हाथ तो सही रास्ता दिखाएगी जिंदगी, अगर है विस्वास खुद पर तो हर कठिनाई को हराएगी जिंदगी, अगर है जस्बा कुछ कर गुजरने का तो मुकाम पर पहुँचाएगी जिंदगी, अगर है आस तो जीवन में बहार लाएगी जिंदगी, अगर मुस्करायेंगे आप तो संग मुस्करायेगी जिंदगी, अगर मिला आपका साथ तो कवियत्री हमें बनाएगी जिंदगी।। सुरेखा 7.1.19

बीत गया पूरा साल

लो बीत गया पूरा एक साल, लगता है आया था अभी कुछ ही दिन पहले, सोचा रखा था पहले से सब हमने, इस साल नया क्या है करना , और जीवन में कैसे आगे बढ़ना, किन बातों को रखना है याद और किन्हें भुलना, पर पता नहीं था बीत जाएगा यह इतनी जल्दी, नहीं तो कर लेते हम भी थोड़ी अपनी मर्जी। पर आज जब खोला पुराना हिसाब, चकरा गए देख कर खाली किताब, याद आता है हमें बस इतना आज, थोड़ा रोये तो थोड़ा हंसे थे हम, कुछ परेशानी में तो कुछ मजे में भी कटे थे दिन, कुछ रहे अधूरे तो कुछ पूरे हुए थे ख्वाब, पर जिंदगी की कश्मकश में भूल गए रखना हिसाब, इसी चक्कर मे रह गई खाली हमारी किताब, लो बीत गया इतनी जल्दी पूरा एक साल| सुरेखा 31.12.18

आइसक्रीम वाला

जब मै एक छोटी बच्ची थी, उम्र मेरी कच्ची सी थी, आइसक्रीम वाले की डुगडुगी, लगती बहुत अच्छी सी थी | तब देखा था मैंने एक सपना, बड़े होकर कुछ और न करना, सबसे अच्छा है बस, एक आइसक्रीम वाला बनना| सोचती थी, मैं यह हर रोज, होकर बड़ी बेचूंगी जब, आइसक्रीम दूसरों को अपनी, मिलेगी मुझे भी खाने को ढ़ेर | सोचती थी , खाऊँगी आइसक्रीम मैं हर रोज, भरकर अपना पूरा पेट, तब होगी ना कोई रोक टोक, ना ही देना होगा उसका कोई मोल | सोचती थी , होगी मेरी आइसक्रीम सबसे अनमोल, जिसमे होगा दूध, चीनी और तरह तरह के फलों का मेल, लाल, पीली, नारंगी और सफेद | पता नहीं था, इतनी मुश्किले है जिंदगी में उसकी, घूम घूम कर बेचता है, वह आइसक्रीम हर रोज़, चाहे हो मौसम का कितना भी ख़ौफ़| पता नहीं था, होते हुए इतनी सारी आइसक्रीम पास, जो लाये दुसरे बच्चों के मन में मिठास, रहता है हरदम क्यों इतना उदास| पता नहीं था, नहीं पता स्वाद आइसक्रीम का उसको, उसने तो क्या कभी चखी नहीं है, आइसक्रीम बच्चों ने उसके। पता नहीं था, रहता है हरदम वह यही सोच, रह ना जाए बच्चे उसके आज, रोटी को मोहताज| पता नहीं था, है...