धुंध
कैसी यह धुंध छाई है चारो ओर , सूझ नहीं रही राह भी सीधी सी, दिखलाये रास्ता कैसे किसी और को, पहुँचाये कैसे उन्हें मंजिल उनकी सही। पता नहीं यह धुंध कब होगी खत्म, दिखेगा सभी को साफ़ साफ़ तभी, तब तक तो बदल गए होंगे हालात सभी, यदि नहीं भगाया यह अंधकार जल्दी ही । अभी तो फसें है सभी अपने और पराये में, चढ़ा कर धुंध गहरी लालच की दिमाग पे, चिन्ता नहीं है जब अपने ही भविष्य की, तो क्या सोचेंगे वो देश की प्रगति की । मची है चारो ओर कुर्सी की खींच तान, पर सोयें है भारतवासी अपनी चादर तान , जब हटेगी चादर सबकी जागेंगे नींद से तभी, तब तक तो हो जाएगी सबकी खटिया खड़ी | अगर रहते हुए समय नींद से ना जागे हम, सभी जगह के और सारे भारतवासी हमारे, बचा ना पायेंगे अपने देश की यह शान, होना होगा तब अपनों का ही गुलाम | अब तो जागों सारे भारत वासी हमारें, मिलकर लगायो जय हिंद के नारे सारे, बचानी है मिलकर देश की आन और शान, तभी बनेगा हमारा प्यारा भारत देश महान!!!!! सुरेखा