मेरा सपना
देखा था कल रात मैंने भी एक सपना,
जिसमे थे सभी अनजान कोई था ना अपना, पर उन अनजान लोगों से था कोई भय ना।
काश यह सपना नहीं होता एक सच ,
तो न टूटती किसी की आस,
ना ही उठता किसी पर से विशवास।
आजकल के तेजी से बदलते युग में,
जब रही नहीं आस्था अपनो पर ,
तो कैसे करे एतबार परायो पर।
पता नहीं वह कल कब आएगा,
जब मेरा यह सपना हकीकत में बदल जायेगा,
रहेगा कोई न भेद अपने और परायो में,
तब भय मुक्त जीवन जीने का मजा कुछ और ही आएगा।
सुरेखा
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